‘अपने तरीके से जीवन जीने वाली महिलाओं को भी Me too शेयर करने के लिए एक विशेष सीज़न का इंतज़ार था’

मैं ये भी दावे से लिख रहा हूँ कि इनमें से एक फीसदी महिलाएं या शायद एक महिला भी फ़ेसबुक और ट्विटर पर चीखते अपने अपने इन “Me too” को कोर्ट में फॉलो नही करेगी।

New Delhi, Oct 11 : इस “Me too” में एक बड़ी गौर करने वाली बात है। ये सारी महिलाएं पढ़ी लिखी हैं। अपने पैरों पर खड़ी हैं। अपनी मर्ज़ी का जीवन जी रही हैं। कुछ तो अपने अपने क्षेत्रों की सेलिब्रिटी भी हैं। पर इन सभी को अपना अपना Me too शेयर करने के लिए एक विशेष सीज़न का इंतज़ार था। शायद इससे पहले अगर बयां करतीं तो कोई सुनता नही! शायद इससे पहले किसी महिला ने अपने शोषण के खिलाफ कोई लड़ाई लड़ी नही होगी!

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शायद तरुण तेजपाल को सलाखों के पीछे पहुंचाने वाली महिला पत्रकार की आवाज़ भी इन्होंने नही सुनी होगी। मैं ये भी दावे से लिख रहा हूँ कि इनमें से एक फीसदी महिलाएं या शायद एक महिला भी फ़ेसबुक और ट्विटर पर चीखते अपने अपने इन “Me too” को कोर्ट में फॉलो नही करेगी। जबकि ये सारी घटनाएं IPC के तहत संज्ञेय अपराध हैं। ये सारे के सारे “Me too” के हैशटैग बहादुरी के तमगे की तरह कुछ दिनों तक गले मे लटकाए जाएंगे और फिर “Not in my name” वाले हैशटैग की तरह कपूर बनकर उड़ जाएंगे।

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मैंने “इज़्ज़त के नाम पर” किताब पढ़ी है। पाकिस्तान की मुख्तार माई की कहानी जिसके साथ साल 2002 में छह दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार किया। मुख्तार माई के 12 साल के भाई पर ऊंची जाति से ताल्लुक रखने वाले मस्तोई बलोच तबके की एक महिला से शारीरिक संबंध के आरोप लगाए गए और पंचायत ने बदले में मुख्तार माई को सामूहिक बलात्कार की घिनौनी सज़ा दी। उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया गया। मुख्तार माई ने देश की सर्वोच्च अदालत तक अपनी लड़ाई लड़ी। दोषियों को सज़ा दिलवाई। वे आज भी देश विदेश की दमित महिलाओं की खातिर रोशनी की किरण हैं। पर यकीन मानिए फ़ेसबुक पर attention खींचते इन Me too के साथ ऐसी कोई लड़ाई नही लड़ी जा रही है।

ये सारे मौसमी Me too जब ख़तम हो जाएं तो इस देश के खेत खलिहानों, छोटे शहरों और धुंध में खोए गांवों के बारे में भी ज़रा बात हो जाए जहां डंके की चोट पर औरत के शोषण का इतिहास लिखा जा रहा है और उन गुमनाम पीड़िताओं की तकलीफ को फॉलो करने की कूवत न किसी अखबार में है, न चैनल में, न सरकारी मशीनरी में, न समाज मे, न किसी महान संपादक में, न किसी स्वनामधन्य एक्टिविस्ट में! सच्चाई तो ये भी है कि उन महिलाओं को तो न “Me” का अर्थ मालूम है और न ही “Too” का! उन्हें बस अपनी नियति के अर्थ मालूम हैं!

(टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)