देश की जनता काफी समझदार है, कौन चोर है और कौन ईमानदार, वो भलीभांति जानती है

इस सवाल को उठाने का हक कांग्रेस 1991 में ही खो चुकी है जब उसने देश में उदारवादी नीतियों को लागू किया था।

New Delhi, Aug 15 : पिछले पोस्ट पर कई साथियों ने कई सवाल उठाए..तो जवाब देना मेरा दायित्व बनता है.. लेकिन मैंने सोचा की सबको अलग अलग जवाब देने के बजाय एक नया पोस्ट ही क्यों नहीं लिख दूं. दोस्तों का सबसे मूल प्रश्न ये है कि HAL की जगह अनिल अंबानी को राफेल बनाने का ठेका क्यों दिया गया.. जबकि इस कंपनी को कोई अनुभव नहीं है. दरअसल, ये सबसे बड़ा झूठ है जो कांग्रेस की तरफ से फैलाई जा रही है. ये झूठ कैसे है ये आगे बताउंगा लेकिन ये बात भी जानना जरूरी है कि 2012 में कांग्रेस पार्टी इसके मंत्रीगण मुकेश अंबानी के साथ ये सौदा कर रहे थेे. उस वक्त इनकी मोरालिटी कहां गायब हो गई थी? तब ये ठीक था लेकिन बस भाई को बदला गया तो अनर्थ हो गया? अजीब तर्क है.

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अब जरा अंबानी और HAL को लेकर जो कहा जा रहा है वो समझते हैं. राफेल सौदे 7.87 अरब यूरो (करीब 59,000 करोड़ रुपये) का है. इसके साथ ‘ऑफसेट’ कॉन्ट्रैक्ट भी है. इसका मतलब ये है कि संबंधित कंपनी को सौदे की राशि का एक निश्चित प्रतिशत हिंदुस्तान में लगाना पड़ेगा. इस समझौते में 50 प्रतिशत ऑफसेट बाध्यता है, जो देश में अब तक का सबसे बड़ा ‘ऑफसेट’ अनुबंध है. ‘ऑफसेट’ समझौते का मुख्य बिंदु यह है कि इसका 74 प्रतिशत भारत में आयात किया जाएगा. इसका मतलब है कि करीब 22,000 करोड़ रुपये का सीधा कारोबार होगा. इसमें टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप की भी बात है, जिसमें रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानि डीआरडीओ शामिल है. ये सब इसलिए ताकि मेक इन इंडिया को बढावा मिल सके. ये सब यूपीए के मसौदे में नहीं था.

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एक बात समझने की ये है कि किसी भी विमान को बनाने में कई कंपनियों की हिस्सेदारी होती है. एक छत के नीचे सबकुछ नहीं बनता. इसके अलग अलग कोंपोनेंट्स को अलग अलग कंपनियों से लिया जाता है. लाजमी है कि राफेल सौदे में अन्य कंपनियां भी हैं, जिनमें फ्रांस की एमबीडीए तथा थेल्स शामिल हैं. इनके अलावा सैफरॉन भी ऑफसेट बाध्यता का हिस्सा है. दोनों कंपनियों के संयुक्त बयान के अनुसार, इन ऑफसेट बाध्यताओं के लागू करने में संयुक्त उद्यम दस्सो रिलायंस एयरोस्पेस प्रमुख कंपनी होगी.
मतलब ये कि राफेल फाइटर प्लेन को बनाने के लिए रिलायंस को नहीं चुना गया है. दस्सो के साथ जो ज्वाइंट वेंचर कंपनी बनी है वो नई कंपनी राफेल फाइटर जेट के लिए पूरी सप्लाई चेन तैयार करेगी. मतलब ये कि ये ज्वाइंट वेंचर कंपनी हिंदुस्तान में राफेल फाइटर जेट को सिर्फ एसेंबल करेगी. वैसे भी रिलायंस डिफेंस का पहले से थेल्स कंपनी के साथ एक ज्वाइंट वेंचर है जिसे राफेल के लिए राडार और इलेक्ट्रोनिक्स की सप्लाई के लिए चुना गया था. इसलिए ये कहना कि रिलायंस को कोई अनुभव नहीं है.. ये पूरी तरह बकवास है.

लेकिन कुछ लोग ये भी सवाल पूछ रहे है कि HAL को इस मसौदे से क्यों बाहर रखा गया? इस सवाल को उठाने का हक कांग्रेस 1991 में ही खो चुकी है जब उसने देश में उदारवादी नीतियों को लागू किया था. जिसके लिए ये लोग (नरसिम्हा राव की जगह) मनमोहन सिंह की पूजा करते हैं. HAL एक पब्लिक सेक्टर युनिट है. हिंदुस्तान की अकेली कंपनी जिस पर लड़ाकू विमान बनाने की जिम्मेदारी थी. लेकिन सवाल ये है कि 1940 से अब तक इस सरकारी कंपनी ने भारत को क्या दिया? क्या हिंदुस्तान की वायुसेना HAL के बनाए विमानों का इस्तेमाल कर रही है? दलाली और कमाई के चक्कर में कांग्रेस पार्टी की सरकारों ने रक्षा के क्षेत्र में कभी आत्मनिर्भर होने की कोशिश ही नहीं की. हम मंगल पर यान भेज पाने में सक्षम हैं लेकिन विश्वस्तरीय विमान तो दूर .. आर्मी के लिए हम एक अच्छी राय़फल नहीं बना पा रहे हैं. ये जानबूझ कर किया गया. क्योंकि देश की रक्षा के नाम पर इन लोगों ने दलाली और भ्रष्टाचार का एक अभेद्य नेटवर्क तैयार कर रखा है. अब ये टूट रहा है तो कांग्रेस पार्टी को दर्द हो रहा है.

मोदी सरकार जब से आई है तब से डिफेंस मार्केट को खोलने की शुरुआत हुई है. ये एक अच्छी शुरुआत है. हथियार और विमान बनाना कोई मैकडोनॉल्ड की टिकिया या कोकाकोला की शिकंजी तो है नहीं… इसमें काफी कैपिटल की जरूरत होती है. सरकार ने हथियार के बाजार को खोला तो रिलायंस, टाटा, L&T, गोदरेज जैसे बड़ी कंपनियों ने इस क्षेत्र में निवेश करना शुरु किया. विदेशी कंपनियों से ज्वाइंट वेंचर शुरु किया. इस बैकग्राउंड में राफेल का मसौदा होता है तो इसकी ऑफसेट कांट्रैक्ट को अमली जामा पहनाने के लिए किसी कंपनी की तो जरूरत पडेगी ही. HAL पहले के दिए हुए टारगेट को पूरा नहीं कर पा रही है तो ये लाजमी है कि किसी प्राइवेट कंपनी को ये काम दिया जाए. इसके लिए रिलायंस को चुना गया तो कौन सा पहाड़ टूट गया. जब काग्रेस पार्टी भी 2012 में मुकेश अंबानी के साथ यही काम करने में लगी थी.. लेकिन वो सौदा रास्ते में ही लटक गया इसलिए कांग्रेस इस काम को पूरा नहीं कर पाई. अब यही काम मोदी सरकार कर रही तो राहुल गांधी घोटाला.. घोटाला चिल्ला रहे हैं.

याद रखने वाली बात ये है कि लड़ाकू विमान राफेल की ख़रीददारी एक विशेष परिदृश्य में की गई, जब भारत का चीन और पाकिस्तान के बीच रिश्ते तनावपूर्ण होने लगे थे. बॉर्डर पर लगातार गोलीबारी और पठानकोट व उरी जैसे हमलों के बाद देश चिंता बढ़ने लगी थी. चीन के साथ डोकलाम में सेना आमने सामने थी. किसी भी वक्त मामला बिगड़ने का डर सताने लगा था. ऐसे नाजुक हालात में भारत को एक विश्वस्तरीय फाइटर प्लेन की जरूरत थी. ऐसा माहौल में जो डील मोदी सरकार ने की उसकी तारीफ होनी चाहिए न कि बिना जानकारी और सबूत के राजनीतिक फायदे के लिए तमाशा करना चाहिए. ये मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से ज़ुडा है, फ्रांस जैसे मददगार साथी देश के साथ रिश्ते से जुड़ा है.. ऐसे में विपक्ष का भी ये दायित्व है कि वो जिम्मेवार बने. वैसे देश की जनता काफी समझदार है.. कौन चोर है और कौन ईमानदार.. वो भलीभांति जानती है.

(वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)