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कुछ ऐसी है महिला कुली मंजू की लाइफ, कहानी सुन राष्ट्रपति भी हो गये थे भावुुक

इसी साल 20 जनवरी को देशभर की 90 महिलाओं को अपनी अलग पहचान बनाने के लिये राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद ने पुरस्कृत किया था।

New Delhi, May 29 : ट्रेन से उतरते यात्रियों की एक आवाज की आस में पुरुष कुलियों के बीच बैठी इस महिला कुली का नाम है मंजू देवी। वो जयपुर रेलवे स्टेशन पर काम करने वाली एक मात्र महिला कुली हैं, अपने तीन बच्चों के परिवार में वो अकेली कमाने वाली है। पति की मौत हो जाने के बाद उन्हें मजबूरी में ये काम करना पड़ रहा है, ताकि वो अपने बच्चों का लालन-पालन कर सके। लेकिन आज उन्हें ना तो इस काम को करने में शर्म महसूस होती है, और ना ही यात्रियों के वजनी सामान को उठा कर ले जाने में तकलीफ महसूस होती है।

राष्ट्रपति ने किया पुरस्कृत
मंजू देवी ग्राम पंचायत रामजीपुरा कलां के गांव सुन्दरपुरा की रहने वाली हैं, इसी साल 20 जनवरी को देशभर की 90 महिलाओं को अपनी अलग पहचान बनाने के लिये राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद ने पुरस्कृत किया था। जिसमें मंजू देवी भी शामिल थी। मंजू की कहानी सुन राष्ट्रपति भी इमोशनल हो गये थे।

शुरुआत में शर्म आती थी
मंजू देवी ने बताया कि जब उन्होने कुली का काम करना शुरु किया था, तो उन्हें शर्म महसूस होती थी, वो किसी से भी काम मांगने में शर्माती थी, लेकिन बच्चों का पेट पालने और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच ये सब छोटा लगने लगा, अब वो बिना किसी शर्म या झिझक के काम करती हैं, मेहनत के पैसे लेते हैं और अपने घर लौट जाती है।

मां ने बढाया हौसला
रिपोर्ट के अनुसार मंजू के पति की मौत करीब दस साल पहले हुई थी। पारिवारिक कलह और मानसिक तनाव के बीच उनकी मां ने उनका हौसला बढाया, उन्हें काम करके अपना घर-परिवार चलाने के लिये प्रेरित किया। जिसके बाद मंजू ने पति का कुली लाइसेंस नंबर 15 हासिल किया, और जयपुर रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने लगी।

यूनिफॉर्म बनी चुनौती
रेलवे अधिकारियों ने उन्हें बताया कि चूंकि जयपुर रेलवे स्टेशन पर कोई महिला कुली नहीं है, इस वजह से उन्हें परेशानियों से दो-चार होना पड़ सकता है। लेकिन मंजू लाइसेंस लेने की जिद पर अड़ी रही, लिहाजा उन्हें बैज दे दिया गया। फिर उन्होने खुद ही यूनिफॉर्म तैयार किया, तमाम परेशानियों के बाद वो लाल कुर्ते और काले सलवार में स्टेशन पर आती है, रेल यात्रियों से कुली आवाज लगाने की उम्मीद में बैठी रहती है।

सुनाई अपनी संघर्ष की कहानी
राष्ट्रपति भवन में अपने-अपने क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल करने वाली महिलाओं को संबोधित करते हुए मंजू ने कहा कि मेरा वजन 30 किलोग्राम था और रेल यात्रियों के बैग का वजन भी तीस किलो होता था, लेकिन तीन बच्चों को पालने के बोझ ने इस बोझ को हल्का बना दिया। मेरे पति के गुजर जाने के बाद मुझे किसी भी तरह अपने बच्चों को पालना था, इसी वजह से मैं कुली बन गई।

भाई ने दूसरा काम करने की सलाह दी थी
मंजू ने बताया कि उनके भाई ने उन्हें कोई दूसरा आसान काम करने की सलाह दी थी। लेकिन वो कुली बनकर लोगों के सामान उठाती रही। मंजू के अनुसार अधिकारियों ने उन्हें 6 महीने तक ट्रेनिंग दी जिसके बाद वो कुली बन गई। मंजू और दूसरी महिलाओं की कहानियां सुनने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, कि यहां हर किसी के पास सुनाने के लिये अपनी एक कहानी है, इस कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्र की 90 महिलाओं को सम्मानित किया गया।

IBNNews Network

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